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आग़ाज़ और अंजाम

आग़ाज़ और अंजाम


किसी भी सफ़र के दो पहलू हमेशा बेहद ख़ास होते हैं आग़ाज़ और अंजाम। शायद इसलिए कि हम किसी भी चीज़ को उसके शुरू होने और ख़त्म होने से ज़्यादा आसानी से समझ पाते हैं। शुरुआत अपने साथ उत्सुकता, उम्मीद और कई अनकहे ख़्वाब लेकर आती है, जबकि अंजाम अपने साथ एक ठहराव, एक निष्कर्ष और कभी-कभी बहुत सारे सवाल छोड़ जाता है।

दोनों से कई एहसास, कई रंग, कई रिश्ते और कई हमवाबस्ता होते हैं। दोनों अरसे तक गाए जाते हैं, काग़ज़ पर सजाए जाते हैं और यादों में सँभालकर रखे जाते हैं। किसी कहानी का आग़ाज़ याद रहता है, उसका अंजाम याद रहता है, लेकिन उन दोनों के बीच जो कुछ गुज़रता है, उसे हम अक्सर भूल जाते हैं।

कुछ भुलाया जाता है तो वो है सफ़र।

कुछ मिटाया जाता है तो वो है सफ़र।

शायद इसलिए कि सफ़र बहुत लंबा होता है। उसमें बहुत कुछ घटता है और हर चीज़ को याद रखना आसान नहीं होता। सफ़र में सिर्फ़ रास्ते नहीं होते, उसमें हमारे बदलते हुए रूप भी होते हैं। हम जिस जगह से निकलते हैं, अक्सर उसी इंसान की तरह मंज़िल तक नहीं पहुँचते। रास्ते हमें बदल देते हैं। कुछ लोग हमें बदलते हैं, कुछ हादसे, कुछ मुलाक़ातें और कुछ ऐसी ख़ामोशियाँ, जिनका ज़िक्र हम किसी से नहीं करते।

घर से निकलने पर होने वाली हिचकिचाहट का मंज़िल पर पहुँचकर थकावट बन जाने तक का सफ़र यही तो ज़िंदगी है।



एक तरफ़ घर की चौखट होती है, जहाँ से निकलते हुए मन में कई सवाल होते हैं। दूसरी तरफ़ मंज़िल होती है, जहाँ पहुँचकर शायद हमें अपने ही सवालों के जवाब नहीं मिलते, केवल थकान मिलती है। और इन दोनों के बीच जो वक़्त बीतता है, वही हमारा असल सफ़र होता है।

अजनबियों का अपना बन जाने से लेकर अपने आप को अजनबी बनाने तक का सफ़र भी इसी का हिस्सा है।

कुछ लोग सफ़र में मिलते हैं और देखते ही देखते हमारे इतने क़रीब आ जाते हैं कि उनके बिना सफ़र की कल्पना तक मुश्किल लगने लगती है। उनके साथ गुज़रा हुआ थोड़ा-सा वक़्त भी कभी-कभी पूरी उम्र की याद बन जाता है। लेकिन यही सफ़र हमें यह भी सिखाता है कि अपने लोगों के बीच रहते हुए भी कभी-कभी हम ख़ुद से अजनबी हो जाते हैं।

कभी दूसरों को समझते-समझते हम ख़ुद को समझना भूल जाते हैं। कभी किसी रिश्ते को बचाते-बचाते अपने भीतर का कोई हिस्सा खो देते हैं।और कभी किसी को अपना बनाने की कोशिश में ख़ुद से ही दूर चले जाते हैं।मिट्टी से बनकर मिट्टी में मिल जाने तक का सफ़र भी आख़िर इसी कहानी का हिस्सा है।

लोग दिन भी अक्सर पैदा होने या मरने के याद रखते, जीने के नहीं।

किसी के जन्म का दिन याद रहता है। किसी की मृत्यु का दिन याद रहता है। मगर उन दोनों के बीच उसने कितने दिन ख़ुशी में बिताए, कितने दिन रोते हुए, कितनी रातें इंतज़ार में, कितनी सुबहें उम्मीद में और कितने पल केवल ख़ुद को सँभालने में गुज़ारे इसका हिसाब शायद ही कोई रखता है।

और शायद इंसान की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह ज़िंदगी को उसके सफ़र से नहीं, उसके पड़ावों से मापता है।दिल की बातें भी अक्सर सफ़र की शुरुआत या आख़िर में कही और सुनी जाती हैं।

शुरुआत में हम बहुत कुछ कह देना चाहते हैं, क्योंकि सामने उम्मीद होती है। और आख़िर में बहुत कुछ कह देते हैं, क्योंकि तब खोने को शायद कुछ बचा नहीं होता।

लेकिन बीच का जो समय होता है, उसमें हम ख़ामोश रहते हैं।

हम सोचते हैं अभी बहुत वक़्त है। यही ‘अभी’ कभी पता नहीं कब ‘अब नहीं’ में बदल जाता है। फिर क्या फ़र्क पड़ता है अगर इस सफ़र में हम ख़ुश रहें या परेशान? पर्दे खींचकर चलते नज़ारों की तस्वीरें आँखों में बसा लें या आँखें बंद कर सो जाएँ।ज़िद्दी लहरों को प्यार से सहला कर संग बह जाएँ या दूर बैठकर अपनी ज़िद पूरी करें।सरफिरे-सी सड़कों पर झूमकर गाएँ या उन्हें दूर से देखने वाली भीड़ में शामिल हो जाएँ।अपनी परेशानियों को बहाना बना ख़ुद से ख़फ़ा हो जाएँ या ख़ुद को बहाना बना ग़मों को नीचा दिखाएँ। क्या फ़र्क पड़ता है अगर हम ख़ुद से दूर जाकर औरों के क़रीब आएँ या फिर अपनी जगह बनाकर औरों को पास बुलाएँ?

शायद बहुत फ़र्क पड़ता है।

मगर उस फ़र्क को समझने में हमें अक्सर बहुत देर लग जाती है। क्योंकि हम अपने सफ़र को ख़ूबसूरत बनाने का सारा बोझ किसी और पर डाल देना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि कोई आए और हमारे रास्ते आसान कर दे। कोई हमारी ख़ामोशी समझ ले। कोई हमारे भीतर चल रही उथल-पुथल को बिना पूछे समझ जाए। कोई हमारी थकान देख ले और हमें बिना कहे थाम ले।

और जब ऐसा नहीं होता, तो हम शिकायत करते हैं। शिकायत करना ज़िम्मेदारी लेने से ज़्यादा आसान है।अपने सफ़र की ख़ूबसूरती का ज़िम्मा किसी और को सौंप देना आसान है, क्योंकि फिर अगर रास्ता ख़राब हो तो दोष भी किसी और का होगा। हम अपनी परेशानियों का इल्ज़ाम हालात पर लगा सकते हैं, अपने अकेलेपन का इल्ज़ाम लोगों पर, अपनी अधूरी उम्मीदों का इल्ज़ाम रिश्तों पर और अपने अधूरे सफ़र का इल्ज़ाम किसी एक इंसान पर।

लेकिन क्या सचमुच कोई दूसरा हमारे सफ़र के लिए इतना ज़िम्मेदार हो सकता है?



फ़र्क नहीं पड़ता उनको।

क्योंकि वो अपने सफ़र के मुसाफ़िर हैं, हमारे नहीं। वो हमारे सफ़र का एक ख़ूबसूरत हिस्सा बन सकते हैं, लेकिन हमारा पूरा सफ़र नहीं। यह बात शायद स्वीकार करना आसान नहीं है।

हम जिनसे प्रेम करते हैं, जिनसे जुड़ते हैं, उनके साथ पूरी उम्र की कल्पना करने लगते हैं। हमें लगता है कि उनकी मौजूदगी ही हमारी मंज़िल है। मगर हर रिश्ता मंज़िल नहीं होता।

कुछ रिश्ते केवल रास्ते होते हैं।

कुछ लोग हमें मंज़िल तक पहुँचाने नहीं, बल्कि हमें रास्ते में कुछ सिखाने आते हैं।

कुछ हमें यह बताते हैं कि प्रेम क्या होता है।

कुछ यह कि बिछड़ना क्या होता है।

कुछ हमें दूसरों को समझना सिखाते हैं और कुछ हमें ख़ुद को समझने के लिए मजबूर कर देते हैं। इसलिए कोई व्यक्ति हमारे सफ़र का बहुत ख़ूबसूरत हिस्सा तो हो सकता है, लेकिन वह हमारा पूरा सफ़र नहीं हो सकता।

आख़िर हर इंसान अपने सफ़र का मुसाफ़िर है।

उसके अपने रास्ते हैं, अपने ख़्वाब हैं, अपनी मजबूरियाँ हैं, अपने सवाल हैं और अपने अंजाम की तरफ़ बढ़ते हुए उसके अपने क़दम हैं।

हम किसी के साथ चल सकते हैं, लेकिन उसकी जगह नहीं चल सकते। इसीलिए शायद रिश्तों को मंज़िल समझ लेना सबसे बड़ी भूल है।

रिश्ते सफ़र को ख़ूबसूरत बना सकते हैं, लेकिन सफ़र की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते।

और शायद यही वजह है कि अंत में फ़र्क किसी को नहीं पड़ता।आख़िर में हम और हमारा सफ़र आमने-सामने खड़े होते हैं।तब कोई दूसरा हमारे साथ नहीं होता। तब न शिकायत काम आती है, न इल्ज़ाम। तब केवल यह सवाल बचता है कि हमने अपने हिस्से की ज़िंदगी किस तरह जी।

क्या हमने सच में ख़ुश रहने की कोशिश की थी?

क्या हमने प्रेम किया था?

क्या हमने उन पलों को महसूस किया था जिन्हें हम यह सोचकर टालते रहे कि अभी बहुत वक़्त है?

क्या हमने अपनी ख़ुशी किसी और के आने की प्रतीक्षा में रोक दी थी?

और सबसे बड़ा सवाल

क्या हमने अपना सफ़र जिया था, या केवल उसके अंजाम की प्रतीक्षा की थी?

लोग दिन भी अक्सर पैदा होने या मरने के याद रखते हैं… जीने के नहीं।

शायद हमें भी कभी-कभी अपने जीवन के उन दिनों को याद करना चाहिए जिनका कोई ख़ास मौक़ा नहीं था।

वो साधारण दिन, जिनमें हमने किसी के साथ चाय पी थी।

वो रास्ते, जिन पर चलते हुए किसी ख़ास वजह के बिना ख़ुश हुए थे।

वो बातचीत, जो घंटों चली थी लेकिन जिसका कोई निष्कर्ष नहीं था।

वो शामें, जिनमें हम बस बैठे रहे थे।

वो आँसू, जिन्हें किसी ने नहीं देखा।

वो हँसी, जिसका कोई गवाह नहीं था।

क्योंकि शायद यही जीवन था।

दिल की बातें भी अक्सर सफ़र की शुरुआत या आख़िर में कही और सुनी जाती हैं। मगर शायद ज़िंदगी हमें यह सिखाने के लिए ही इतनी लंबी लगती है कि कुछ बातें समय रहते कह देनी चाहिए। हर बात को आख़िर के लिए बचाकर रखना ज़रूरी नहीं। हर मोहब्बत को इज़हार के लिए आख़िरी पल का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। हर ख़ुशी को किसी बड़ी वजह की ज़रूरत नहीं होती।

क्योंकि समय का भरोसा नहीं।

एक दिन अचानक महसूस होता है कि सफ़र ख़त्म होने वाला है।

तब याद आता है कि कुछ बातें कहनी थीं।

कुछ लोगों को रोकना था।

कुछ रास्तों पर मुड़ना था।

कुछ ख़ुशियाँ बिना किसी कारण के मनानी थीं।

कुछ तस्वीरें खींचनी थीं।

कुछ नज़ारे आँखों में बसाने थे।

कुछ लोगों को यह बताना था कि उनका होना हमारे लिए मायने रखता था।

लेकिन समय कभी पीछे मुड़कर नहीं आता।

वह केवल आगे जाता है।

और शायद जीवन का सबसे कठोर सत्य यही है कि हमें जीवन तब समझ आता है, जब उसका एक बड़ा हिस्सा हमारे पीछे छूट चुका होता है।

और फिर आता है अंजाम।

आग़ाज़ हमेशा कोरे काग़ज़ और गहरी स्याही से शुरू होता है।

हम उस काग़ज़ पर अपने ख़्वाब लिखते हैं। अपने रिश्ते लिखते हैं। अपने वादे लिखते हैं। अपनी उम्मीदें लिखते हैं। कुछ नाम ऐसे लिखते हैं जिन्हें हम समझते हैं कि कभी मिटाएँगे नहीं।

मगर वक़्त अपनी अलग ही तहरीर लिखता है।वह धीरे-धीरे उस काग़ज़ पर अपनी उँगलियाँ फेरता है।कुछ लफ़्ज़ धुँधले हो जाते हैं। कुछ मिट जाते हैं। कुछ के मायने बदल जाते हैं। और कुछ इतने गहरे उतर जाते हैं कि उन्हें मिटाने की कोशिश में काग़ज़ ही ज़ख़्मी हो जाता है।

पर अंजाम?

अंजाम, एक कोरा काग़ज़, एक मुकम्मल अफ़साना या फिर एक स्याह पन्ना!

किसी के हिस्से में मुकम्मल कहानी आती है।

किसी के हिस्से में अधूरा अफ़साना।

किसी के हिस्से में कुछ खूबसूरत यादें।

और किसी के हिस्से में ऐसे पन्ने आते हैं जिन्हें वह पूरी उम्र पलटने से डरता है। लेकिन हर अंजाम अपने पीछे कुछ छोड़ जाता है।

कोई सबक़।

कोई ज़ख़्म।

कोई ख़ुशी।

कोई नाम।

या फिर केवल एक ख़ामोशी।

और शायद यही ज़िंदगी का दस्तूर है।

हर सफ़र का अंजाम एक जैसा नहीं हो सकता।

हर कहानी का अंत ख़ुशनुमा नहीं होता।

हर रिश्ता उम्रभर नहीं चलता।

हर मोहब्बत मुकम्मल नहीं होती।

हर इंतज़ार का जवाब नहीं मिलता।

फिर भी सफ़र की अहमियत कम नहीं होती।

क्योंकि शायद मंज़िल से ज़्यादा मायने उस इंसान के होते हैं जो मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते बदल चुका होता है। आख़िर में हमारे पास वही रहता है जो हमने रास्ते में अपने भीतर जमा किया।

हमारे अनुभव।

हमारी यादें।

हमारे रिश्ते।

हमारी ग़लतियाँ।

हमारी मोहब्बत।

हमारी ख़ामोशियाँ।

और वे तमाम लफ़्ज़, जिन्हें हम कह नहीं पाए।

इसलिए शायद सफ़र को केवल इसलिए ख़ूबसूरत नहीं बनाना चाहिए कि उसका अंजाम ख़ूबसूरत हो। उसे इसलिए ख़ूबसूरत बनाना चाहिए क्योंकि वह हमारा है।

क्योंकि जब तक स्याही गीली है, तब तक हमारे पास लिखने का मौक़ा है।



क्या लिखना है, यह चुनाव भी हमारा है।

किसे अपनी कहानी में जगह देनी है , यह भी हमारा है।

किस पन्ने को पलटना है और किस पन्ने पर ठहरना है, यह भी हमारा है।

और शायद सबसे ज़रूरी बात

किसी दूसरे को अपनी पूरी कहानी बना देना भी हमारा ही चुनाव है।

आख़िर में फ़र्क किसी को नहीं पड़ता।

फ़र्क पड़ता है तो केवल हमें।

क्योंकि अंजाम आने के बाद जब हम अपने सफ़र को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमें किसी और से नहीं, ख़ुद से जवाब चाहिए होता है।

और उस वक़्त शायद सबसे बड़ा सवाल यही होता है

क्या मैंने अपना सफ़र सचमुच जिया था?

आग़ाज़ और अंजाम दोनों ही सफ़र के बेहद ख़ास पहलू होते हैं।

आग़ाज़ हमेशा कोरे काग़ज़ और गहरी स्याही से शुरू होता है।

पर अंजाम?

अंजाम एक कोरा काग़ज़, एक मुकम्मल अफ़साना या फिर एक स्याह पन्ना।

और शायद इन तीनों के बीच का फ़र्क केवल इतना है कि हमने अपनी स्याही को किस तरह बहने दिया।

क्योंकि आख़िर में काग़ज़ वही रहता है। सफ़र वही रहता है।अंजाम भी एक दिन आ ही जाता है।बदलती रहती है तो बस स्याही।

कभी गहरी। कभी हल्की। कभी ख़ूबसूरत। कभी स्याह।

खेल केवल स्याही का है।



- Prachi 

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