वहाँ उसके पास एक कमरा था, जो धीरे-धीरे खाली होता जा रहा था। अजीब बात यह थी कि वह जितना स्वयं को भीतर से रिक्त कर रही थी, वह कमरा उससे उतने ही अधिक सवाल पूछने लगा था। उस कमरे के हर कोने में एक किताब रखी थी, किसी की याद की किताब। उनके पन्ने समय की धूप में धीरे-धीरे पीले पड़ते जा रहे थे। अब वह उन्हें पढ़ नहीं पाती थी। यह बात उसे परेशान भी करती थी और चिंतित भी।
कुछ किताबें ही तो बची थीं उसके पास। फिर क्यों वह उनसे भी दूरी बनाने लगी थी?
शायद इसलिए कि वे सिर्फ किताबें नहीं थीं। वे किसी की मौजूदगी के अंतिम प्रमाण थीं। और यादों को बार-बार दोहराना उसे भूलने जैसा लगता था। वह भूलना नहीं चाहती थी। शायद यही कारण था। हाँ, यही कारण था।
उसे मालूम था कि उस रोशनदान से, जो कमरे की सबसे दूर वाली दीवार पर उसकी जीने की उम्मीद का एक छोटा-सा टुकड़ा था, अब कभी सूरज की पहली किरण उसके बिस्तर तक नहीं पहुँचेगी। कोई सुनहरी शाम भी उसके घुटन भरे कमरे में आराम की कोई रात छोड़कर नहीं जाएगी।
जीवन में एक समय ऐसा आता है जब सुबह, दोपहर, शाम और रात के बीच का अंतर धुँधला पड़ने लगता है। समय अपनी पहचान खो देता है। लेकिन उसी समय जब आप आईने में खुद को देखते हैं, तो आपको लगता है कि शायद अभी भी कुछ बदला जा सकता है।
आप दुनिया की लगभग हर चीज़ से नाउम्मीद हो सकती हैं, लेकिन आपका चेहरा अक्सर आपको उम्मीद दे देता है। उसका चेहरा भी ऐसी ही उम्मीदों का चेहरा था। उसे विश्वास था कि वह एक दिन इस तन्हाई, इस खामोशी, इस उदास शांति, इस बेचैनी, इन अधूरी इच्छाओं, इन किताबों, इन तस्वीरों, दुनिया से इस दूरी और अंत के इस लंबे इंतज़ार से बाहर निकल आएगी।
लेकिन उसे एक डर भी था।
डर यह कि जब तक वह जीवन की उस चमकीली और गर्म सतह तक पहुँचेगी, तब तक क्या कुछ भी बचा रह जाएगा?
क्या वह अपने वर्तमान को अपने भविष्य में, अपने अतीत की लूटी-पिटी गौरवगाथा के अतिरिक्त कुछ और कह पाएगी?
क्या उसके भविष्य का भूगोल उसके अतीत के खंडहर हो चुके इतिहास को बचा पाएगा?
उसे पता था कि आईने में खुद को देखते हुए उसने जो कुछ लिखा है, वह शायद वैसी कभी थी ही नहीं। उसने उम्मीद के कंधों से खुद को उतार लिया था। नीचे उतरने के लिए गहराई बहुत थी और कोई सीढ़ी नहीं थी। अंततः उसे छलाँग लगानी ही पड़ी।
उस छलाँग में वह घायल हो गई थी।
घाव दिखाई नहीं देते थे। कोई निशान भी नहीं था। बस खून के कुछ थक्के थे पहले लाल, फिर धीरे-धीरे काले पड़ते हुए।
उन्हें छिपाने के लिए वह अब स्कर्ट पहनती थी। स्कर्ट में वह सुंदर लगती थी, लेकिन अब वह किसी को आकर्षित नहीं करना चाहती थी। वह उन शरारती बच्चों जैसी हो गई थी जो एक निश्चित उम्र के बाद अचानक बहुत गंभीर हो जाते हैं, जैसे जीवन ने उन्हें समय से पहले बड़ा होने की सज़ा दे दी हो।
जब वह छोटी थी, तब पेप्सी, समोसे और गोलगप्पे उसके लिए उत्सव की तरह थे। वह उनके लिए रोमांचित हो जाती थी। लेकिन अपने बड़ों को देखकर हैरान होती थी कि उनमें इस सबके लिए कोई उत्सुकता क्यों नहीं बची।
वह सोचती थी कि कोई ऐसा कैसे हो सकता है जिसे इन चीज़ों की भूख न हो, प्यार न हो, लालच न हो, उत्साह न हो?
आज जब वह स्वयं उसी जगह खड़ी थी, तब वह उस उदासीनता को समझने लगी थी।
उत्साह से उदासीनता तक का सफर जितना छोटा दिखाई देता है, वास्तव में उतना होता नहीं। उसके पीछे असंख्य त्रासदियाँ होती हैं। कई प्रियजनों को खोना पड़ता है। कई सपनों को दफनाना पड़ता है। अनेक अनुपस्थितियों को, जिन्हें हम कभी स्वीकारना नहीं चाहते, अंततः अपनी नियति मान लेना पड़ता है।
कितनी ही उदासियाँ मिलकर रोज़ कितने ही उत्साहों की हत्या करती हैं।
उदासी को ऐसी हत्याओं में महारत हासिल होती है।
उसके अपराधों का कोई सबूत किसी अदालत में पेश नहीं किया जा सकता। वह कभी किसी उत्साह की हत्या की सज़ा नहीं भुगतती। वह एक बेहद कुशल सीरियल किलर की तरह होती है।
आप जीवन भर उसे चोर-पुलिस के खेल की तरह खोजते रहते हैं, और अंत में पाते हैं कि वह तो हमेशा से आपके भीतर ही रहती थी।
तब एक अजीब सवाल जन्म लेता है
अगर आपको यह पहले ही पता चल जाता, तो क्या आप स्वयं को उन गुनाहों की सज़ा दे पातीं?
शायद नहीं।
शायद हाँ।
जो लोग समय से पहले अपना जीवन समाप्त कर देते हैं, शायद उन्हें अपनी उदासियों का पता मिल जाता है। शायद वे अपने भीतर मारे गए उत्साहों के लिए न्याय चाहते हैं। शायद वे अपनी उदासियों को सज़ा देने के लिए स्वयं को समाप्त कर देना उचित समझ बैठते हैं।
वे शायद न्यायप्रिय होते हैं।
लेकिन दुनिया उन्हें कायर कहती है।
वह याद अब उसके कमरे में कभी नहीं आएगी। उस आईने में उस मुस्कान का कोई प्रतिबिंब फिर कभी नहीं बनेगा।
फिर भी न जाने क्यों उसे लगता था कि शायद जगह बदल लेने से सब ठीक हो जाएगा। शायद एक नया कमरा, एक नया शहर, एक नई सड़क उसके भीतर की टूटन को भी नया बना देगी।
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि यादें दीवारों में नहीं रहतीं।
वे साँसों में रहती हैं।
वे हमारे साथ चलती हैं। हमारे फेफड़ों की हवा में घुल जाती हैं। हमारे शब्दों में, हमारी चुप्पियों में, हमारे अकेलेपन में अपना घर बना लेती हैं।
वह जहाँ भी जाएगी, वह याद उसके साथ जाएगी।
और फिर वह तमाम उम्र बस कमरे बदलती रहेगी, शहर बदलती रहेगी, मौसम बदलती रहेगी, लेकिन जिस चीज़ से भागना चाहती थी, वह हमेशा उसके भीतर मौजूद रहेगी।
शायद कुछ लोग हमारे जीवन से चले जाने के बाद भी नहीं जाते। वे हमारे भीतर एक स्थायी मौसम बन जाते हैं। हम उनसे मुक्त होने की कोशिश करते हैं, उनसे लड़ते हैं, उन्हें भुलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंततः हमें उनके साथ जीना सीखना पड़ता है।
अब उसे धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि हर कहानी का सुखद अंत होना आवश्यक नहीं होता। कुछ कहानियाँ इसलिए नहीं लिखी जातीं कि वे पूरी हों, वे इसलिए होती हैं कि वे हमें बदल सकें।
और शायद वह भी बदल रही थी।
धीरे-धीरे।
चुपचाप।
उसी तरह जैसे किसी पुरानी किताब के पन्ने समय के साथ पीले पड़ जाते हैं, मगर उनके भीतर लिखे शब्द कभी पूरी तरह मिटते नहीं।
शायद जीवन का अर्थ भूल जाना नहीं है।
शायद जीवन का अर्थ उन चीज़ों के साथ जीना सीख लेना है जिन्हें हम कभी भूल नहीं सकते।
~ प्राची।
It's time for change!




Sundar Sundar 💗
ReplyDeleteTo write words in such a way that they touch the heart. Within all of us, there are those incomplete stories somewhere, with which we have learned to live🙂.
ReplyDeleteBeautifully written 🤍
So beautifully expressed 🩶 each word written touched the heart so deep..ur writings r jst beyond the appreciation 😊. Can't wait to read more from you..😍✨
ReplyDeleteKhoo
ReplyDeleteKhoobsurat
ReplyDelete