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एक दिन।

                          एक दिन।



आजकल सुबह होती है मगर सूरज नहीं निकलता। जैसे-तैसे आँखे मींचते हुए पलंग से उतरकर बाथरूम तक जाती हूँ। ब्रश करते हुए शीशे में अपनी शक्ल दिखती है, उसमे सूजी हुई ऑंखें दिखती हैं और उन आँखों में बिखरते सपने। खुद से नज़रें मिलाकर देखने की अब हिम्मत नहीं है। नहाते हुए अपने इस हड्डियों के ढांचे के लिए एक घृणा सी पैदा होती है, माथे पर बनी रेखाएँ न जाने किस शहर का पता बता रही होती हैं, मालूम नहीं। शर्ट पहनते वक्त अनगिनत सवाल मन में आते हैं। क्या कर रही है ? क्यों कर रही है ? ज़िन्दगी में क्या करना है ? कुछ सोचा है ? सब आगे बढ़ रहे है , तू वही की वही है। शर्ट के बटनों के बीच कहीं, यथार्थ और सपनें आपस में नोक झोक करते दिखाई देते है। बाल बनाते वक्त मैं कोसती हूँ आज को और आँखे बंद करती हूँ। मन ने कहीं बस एक रट लगा रखी है कि अब बस बहुत हो गया।

23 की उम्र में कोई थका हुआ कैसे हो सकता है ? ज़िन्दगी के कौन-से पड़ाव पर मैंने जीना छोड़ दिया? यह मुझे खबर नहीं। बस अब व्याकुलता और बेबसी के बीच जी रहा कोई इंसान है।



माँ नाश्ता लेकर आती है और मैं कुर्सी पर बैठकर सामने रखी चाय को देखती हूँ। दायीं तरफ कलम पड़ी है और बायीं तरफ किताब। ऐसा नहीं है कि ज़िन्दगी में हम दोनों रास्ते साथ में नहीं चुन सकते या एक दिन दायीं तरफ और एक दिन बायीं का सफर तय नहीं कर सकते। बात सिर्फ इतनी है कि जब हम बायीं तरफ को चुनकर, मेट्रो के पीछे भागते हुए, अपनी मंज़िल तक पहुंचते है तब ऐसा लगता है जैसे कुछ छूट सा गया है। 

इन सब के बीच, माँ चिल्ला कर बोलती हैं , "अरे चाय ठंडी हो रही है" और फिर ख्याल आता है कि सच में बहुत देर हो गई है। ठंडी चाय के घुट लेते हुए घर से निकलती हुई मैं, बस इतना ही सोच रही होती हूँ कि वो दिन कब आएगा जब मै कलम को चुनूंगी। शायद, जल्द ही।


लिखते हुए में माँ को याद करती हूँ। ज़िन्दगी में कुछ रिश्ते बस रिश्ते भर के लिए ही होते हैं। किसी थके हुए व्यक्ति को या तो प्रेमी की बाँहें चाहिए होती है या फिर माँ की गोद। मेरे पिताजी कहते है कि ज़िन्दगी में किसी से रिश्ता बनाये रखने के लिए व्यव्हार बहुत ज़रूरी है। मगर माँ से रिश्ता रखने के लिए किसे लड़ना पड़ता होगा प्रतिद्वन्दियों से? मैं फिर कहती हूँ कि क्या आपसे भी प्यार पाने के लिए मुझे अपने प्रतिद्वंदियों से लड़ना पड़ेगा और वो कहती है हाँ। इसका क्या अर्थ है मुझे नहीं पता। फिर मैं कहती हूँ कि मुझे ऐसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लेना फिर। वो कहती है जैसी तेरी मर्ज़ी। मेरा माँ के गले ना लग पाना, मेरी व्यकुलता की आग में घी डालने का काम करता है। 
ज़िन्दगी की दौड़ में हम सब अपने-अपने हिस्से की थकान लिए चलते हैं, लेकिन सुकून उन्हें ही मिलता है जो सही जगह पर रुकना जानते हैं।
सुकून वहीँ मिलता है जहाँ प्यार बेपनाह और निःस्वार्थ हो। ज़िंदगी में कुछ रिश्ते बस रिश्ते भर के लिए नहीं होते, वे आत्मा की गहराइयों से जुड़े होते हैं।



 - प्राची।








Comments

  1. खूब छान dear prachi

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  2. Beautiful ❤️😍

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  3. V nice prachi khup mast

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  4. Mam! I love the way you express your thoughts, so pure and you are so kind-hearted pure soul. Mam I want to meet you 🙏🏻

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  5. प्राची बेटा बहुत खूब। 🙏🏻

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  6. So beautifully written 😍 keep going dear 👍

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  7. This is so great ya.....so good written 😍

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  8. Here once again you’re back with a master piece.
    Keep me hooked up till the very last word.

    Keep up the good work. 🩷

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  9. Literatureworld25 March 2025 at 05:39

    Well written!

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  10. Literally lost in words 🤍
    Very nice you strong girl!!

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  11. This comment has been removed by the author.

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  12. I’m falling for your words.
    And these lines..
    किसी थके हुए व्यक्ति को या तो प्रेमी की बाँहें चाहिए होती है या फिर माँ की गोद...
    सुकून वहीँ मिलता है जहाँ प्यार बेपनाह और निःस्वार्थ हो। ज़िंदगी में कुछ रिश्ते बस रिश्ते भर के लिए नहीं होते, वे आत्मा की गहराइयों से जुड़े होते हैं।
    So beautifully written 🫶🏻

    I can see your future bright 🩷

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  13. Ek alag sa thehrav hai tumhare lekh me jaise mano har ek shabd ko motiyo ki tarah piroya gaya ho. Sadharan/aam se aane wale vyaktigat khyalo ko sundarta se pesh kiya hai. Mere bachpan me padhe hue hindi literature ki yaad aa jati hai. wo literature jise sirf marks lane ke liye nai padhta tha.

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